ROOPCHAND - The Poetry





This is the poignant poem in hindi dedicated to a girl, born in the Nat community, who held a dream in her heart—a dream to be educated and be free. 


#The Hindi Poetry:


जब आँखे मेरी खुली…

तोह लगी मुझ पर तप्पा

न जाने क्या नसीब था मेरा…

पर ऐश तोह गज़ब का किया…


किसने पूछा तेरा बाप कौन…

समाज ने कहा रूपचंद…

दिल को लगा तेस, क्योंकि…

चंद रुपयोंसे पैदा जो हुई हूँ…


लड़की थी हाँ, मैं…

लड़की थी हाँ…

इसी की खुशी थी घर में…

क्योंकि नारी नाच लगाई…


बाल मेरे सावरें…

चूड़ी, घुंघरू, काजल…

माला, लाली लिपोटी…

सजाई जैसे डोली…

नाच मेरी रानी…


ऐसे माँ पुकारी…

लहराईयाँ मेरी कलाइयाँ…

ठुमकैं मेरे कमर…

वाह वाह बोली सभा…

बढ़ाया हौंसला मेरा…


पर पता नहीं क्यों…

दिल मान नहीं रहा…

पैसे ज़ेवर मालामाल…

फिर भी सुखा बंजरबाग…


जिस्म मेरा नीला लाल…

दर्दनाक ये ज़ुल्म रहा…

निकालो मुझे इस दर्द से…

न रहूँ मुझे इस ख़ौफ में…


इस पुकार की क्या कोई क़द्र है…

ज़ीलूँ ज़रा मेरे ख़्वाबों में…

खेल ही में क्या तीर मारा…

ये तोह मेरा पेशा ही बन गया…


खुली साँसे लूँ तोह दबोच ले…

हाथ मिलाऊँ तोह घुटं होवे…

ख़्वाब हँसाए, हक़ीक़त रुलाए…

कब तक ये साँसे अटके रहें…


बढ़ना चाहूँ, मैं पढ़ना चाहूँ…

एक मौका तो दे, तुम्हें सबित करदूँ…

रूपचंद नहीं… चाँद सा रूप हूँ मैं…

धन देह नहीं… लेकिन शिक्षा ज़रूर टोलूँ में…





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